
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार 30 मार्च को अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ की 120वीं कड़ी में देशवासियों को संबोधित किया। जल संचयन Water Harvesting एक ऐसा विषय है, जो हर भारतीय के जीवन से गहराई से जुड़ा हुआ है। यह केवल एक आवश्यकता नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत और भविष्य की पीढ़ियों के लिए हमारी जिम्मेदारी भी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विभिन्न मुद्दों के साथ-साथ उन्होंने जल संचयन Water Harvesting की आवश्यकता जैसे ज्वलंत मुद्दे पर भी चर्चा की और जल संचयन के महत्व पर विशेष जोर दिया।
उन्होंने बताया कि पिछले 7-8 वर्षों में भारत में 11 अरब घन मीटर से अधिक पानी का संचयन Water Harvesting किया गया है। यह आंकड़ा न केवल हमारे प्रयासों की सफलता को दर्शाता है, बल्कि यह भी साबित करता है कि यदि संकल्प और सहभागिता हो तो असंभव कुछ भी नहीं।
Water Harvesting: गर्मी के मौसम में जल संचयन की जरूरत
गर्मियों की शुरुआत के साथ ही देश के कई हिस्सों में पानी की समस्या गहराने लगती है। इसे देखते हुए जल बचाने की तैयारियाँ भी शुरू हो जाती हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि जल संचयन Water Harvesting केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह एक जन-आंदोलन है, जिसमें हर व्यक्ति, हर समुदाय की भूमिका होती है।
उन्होंने यह भी बताया कि कई राज्यों में वर्षा जल संचयन Water Harvesting के प्रयासों को गति दी जा रही है। जलशक्ति मंत्रालय और विभिन्न स्वयंसेवी संस्थाएँ इस दिशा में लगातार काम कर रही हैं।
देश में हजारों कृत्रिम तालाब, चेक डैम, बोरवेल रिचार्ज सिस्टम और सामुदायिक सोक पिट (community soak pit) बनाए जा रहे हैं, जिससे भूजल स्तर को बढ़ाया जा सके। ‘कैच द रेन’ (Catch the Rain) अभियान भी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।
यह अभियान केवल सरकार का नहीं, बल्कि पूरे समाज का है, क्योंकि जल संचयन में जितनी अधिक जन-भागीदारी होगी, उतना ही अधिक प्रभावी परिणाम मिलेगा।
कैसे बचा सकते हैं जल?
प्रधानमंत्री मोदी ने इस बात पर बल दिया कि जल संचयन Water Harvesting का सबसे अच्छा तरीका वर्षा जल को संचित करना है। बारिश की हर बूंद को संरक्षित करके हम बड़ी मात्रा में पानी की बर्बादी रोक सकते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि पिछले कुछ वर्षों में इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य हुए हैं।
अगर हम आंकड़ों पर नजर डालें, तो पता चलता है कि पिछले 7-8 वर्षों में देशभर में बने जल संचयन संरचनाओं (टैंक, तालाब, जलाशय, जल पुनर्भरण संरचनाएँ) के जरिए 11 अरब घन मीटर से अधिक पानी संरक्षित किया गया है।
यह आंकड़ा कितना विशाल है, इसे समझने के लिए प्रधानमंत्री ने भाखड़ा नंगल बांध का उदाहरण दिया, जिसमें गोविंद सागर झील का जल संग्रहण 9-10 अरब घन मीटर के बीच होता है। यह देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि देशभर में जल संचयन के छोटे-छोटे प्रयास मिलकर कितने बड़े स्तर पर प्रभाव डाल सकते हैं।
गडग जिले का उदाहरण: समुदाय की शक्ति
प्रधानमंत्री मोदी ने कर्नाटक के गडग जिले का एक प्रेरणादायक उदाहरण साझा किया, जहाँ लोगों ने जल संचयन में सामूहिक प्रयासों की मिसाल कायम की। कुछ साल पहले इस जिले के दो गाँवों की झीलें पूरी तरह सूख गई थीं। यहाँ तक कि पशुओं के पीने के लिए भी पानी नहीं बचा था और झीलें झाड़ियों और घास से भर गई थीं।
लेकिन जब गाँव के लोगों ने झील को पुनर्जीवित करने का संकल्प लिया, तो परिस्थितियाँ बदल गईं। उनके प्रयासों को देखकर सामाजिक संस्थाएँ भी आगे आईं और मिलकर झील से कचरा और गाद हटाने का काम किया।
अब वे बारिश के मौसम का इंतजार कर रहे हैं, ताकि उनकी मेहनत रंग ला सके। यह ‘कैच द रेन’ अभियान का एक बेहतरीन उदाहरण है।
हर व्यक्ति की जिम्मेदारी
प्रधानमंत्री ने सभी नागरिकों से अपील की कि वे भी इस जल संचयन Water Harvesting अभियान का हिस्सा बनें। उन्होंने कहा कि गर्मियों में अपने घरों के बाहर मटकों में ठंडा जल जरूर रखें और छतों या बालकनी में पक्षियों के लिए पानी की व्यवस्था करें। यह न केवल एक पुण्य कार्य है, बल्कि प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी भी है।
जल संचयन केवल सरकार की पहल नहीं, बल्कि समाज का कर्तव्य भी है। ‘मन की बात’ में प्रधानमंत्री मोदी ने जो संदेश दिया, वह हमें जल बचाने की प्रेरणा देता है।
पिछले 8 वर्षों में 11 अरब घन मीटर पानी का संचयन दिखाता है कि यदि हम मिलकर प्रयास करें, तो जल संकट से बच सकते हैं। जल ही जीवन है, और इसे बचाना हर नागरिक की जिम्मेदारी है। अब समय आ गया है कि हम जल संचयन को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएँ और इस जन-आंदोलन को और अधिक मजबूती दें।
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